(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

आश्वमेधिकपर्व


॥ श्रीः ॥
14.117. अध्यायः 117
Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Topics
कृष्णेन युधिष्ठिरंप्रत्यश्वत्थगोब्राह्मणमहिमप्रशंसनपूर्वकं ब्राह्मणभ्रंशकदुष्कर्मकथनम्॥ 1 ॥
Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Text

युधिष्ठिर उवाच।

कीदृशानां तु शूद्राणां नानुगृह्णासि चार्चनम्।
उद्वेगस्तव कस्माद्धि तन्मे ब्रूहि सुरेश्वर॥ 14-117-1(96831)
भगवानुवाच। 14-117-2x(8014)
अव्रतेनाप्यभक्तेन स्पृष्टां शूद्रेण चार्चनाम्।
तां वर्जयामि राजेन्द्र श्वपाकविहितामिव॥ 14-117-2(96832)
नन्वहं शङ्करश्चापि गावो विप्रास्तथैव च।
अश्वत्थोऽमररूपं हि त्रयमेतद्युधिष्ठिर॥ 14-117-3(96833)
एतत्त्रयं हि मद्भक्तो नावमन्येत कर्हिचित्।
अवमानितमेतत्तु दहत्यासप्तमं कुलम्॥ 14-117-4(96834)
अश्वत्थो ब्राह्मणा गावो मन्मयास्तारयन्ति हि।
तस्मादेतत्प्रयत्नेन त्रयं पूजय पाण्डव॥ 14-117-5(96835)
युधिष्ठिर उवाच। 14-117-6x(8015)
ब्राह्मणेनैव देहेन कथं शूद्रत्वमाप्नुयात्।
ब्रह्म वा नश्यति कथं वक्तुं देव त्वमर्हसि॥ 14-117-6(96836)
भगवानुवाच। 14-117-7x(8016)
कूपस्नानं तु यो विप्रः कुर्याद्द्वादशवार्षिकम्।
स तेनैव शरीरेण शूद्रत्वं यात्यसंशयम्॥ 14-117-7(96837)
यस्तु राजाश्रयेणैव जीवेद्द्वादशवार्षिकम्।
स शूद्रत्वं व्रजेद्विप्रो वेदानां पारगोपि सन्॥ 14-117-8(96838)
पत्तने नगरे वाऽपि यो द्वादशसमा वसेत्।
स शूद्रत्वं व्रजेद्विप्रो नात्र कार्या विचारणा॥ 14-117-9(96839)
उत्पादयति यः पुत्रं शूद्रायां काममोहितः।
तस्य कायगतं ब्रह्म सद्य एव विनश्यति॥ 14-117-10(96840)
यः सोमलतिकां विप्रः केवलं भक्षयेद्वृथा।
तस्य कायगतं ब्रह्म सद्य एव विनश्यति॥ 14-117-11(96841)
मैथुनं कुरुते यस्तु जिह्वायां ब्राह्मणो नृप।
तस्य कायगतं ब्रह्म सद्य एव विनश्यति॥ 14-117-12(96842)
विप्रत्वं दुर्लभं प्राप्य दुर्मर्गैरेवमादिभिः।
विनाशयन्ति ये तत्तु ताञ्शोचामि युधिष्ठिर॥ 14-117-13(96843)
तस्मात्सर्वप्रत्नेन मत्प्रियो यो युधिष्ठिर।
जातिभ्रंशकरं कर्म न कुर्यादीदृशं द्विजः॥ ॥ 14-117-14(96844)

इति श्रीमन्महाभारते आश्वमेधिकपर्वणि वैष्णवधर्मपर्वणि सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः॥ 117 ॥


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